अंजोर छत्तीसगढ़ी मासिक पत्र के जून-जुलाई अंक- page-7

बियंग के रंग...साहित्य संसार म व्यंग्य के ठउर 

संजीव तिवारी छत्तीसगढ़ी भाखा के चिन्हारी आय। छत्तीसगढ़ के नक्शा ले जब कभू बाहिर छत्तीसगढ़ी के गोठ होथे त 'गुरतुर गोठ डॉट कॉमÓ के माध्यम ले ही होथे, जेन उंकर सफल संपादन म इंटरनेट म सरलग कई बछर ले पूरा दुनिया म छत्तीसगढ़ी के सोर करत हावय। सोसल मीडिया के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी खातिर वोहर जेन बुता करे हावय ते ह इतिहास के बात आय। ठउका अइसने 'बियंग के रंगÓ के माध्यम ले घलो छत्तीसगढ़ी के गद्य लेखन संसार अउ खासकर व्यंग्य विधा के जोरन-सकेलन वोहर करे हावय, उहू हर इतिहास के बात आय। मोर असन कतकों कम जनइया मन अइसन कहि देवँय के छत्तीसगढ़ी के लेखन ह अभी लइकई अवरधा म हावय.. 'बियंग के रंगÓ ल पढ़ के उंकर मन के भरम ह दुरिहा जाही।
साहित्य संसार म व्यंग्य के ठउर वइसने हे जइसे फूल के पेंड़ म कांटा के होथे। जइसे कांटा ह फूल ल टोर के वोला रउँदे के उदिम करइया मनला छेंकथे, वइसने व्यंग्य घलो ह मानव समाज के मनसुभा ल रउँदे के उदिम करइया मनला हुदरथे, कोचकथे अउ उनला छेंके खातिर दंदोर के चेत कराथे।
छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य के रूप तो जब ले इहां सांस्कृतिक विकास होय हे तब ले देखे ले मिलथे। हमर संस्कृति म बर-बिहाव के बखत जेन भड़ौनी गाये जाथे, वोहर व्यंग्य के मयारुक-रूप आय। एकर पाछू हमर कला-यात्रा के रूप म जेन नाचा-गम्मत के मंच म जोक्कड़ के माध्यम ले हास्य-व्यंग्य के स्वरूप दिखथे, वोहर एकर विकास यात्रा के ही स्वरूप आय। हमर लोक गीत मन म घलोक एकर रूप समाये हे। ददरिया म नायक-नायिका एक-दूसर ल ताना अउ आभा मारथे इहू ह व्यंग्य के सुघ्घर छापा आय।
जिहां तक प्रकाशित साहित्य म व्यंग्य-लेखन के देखे के बात आय त ए ह आजादी के आन्दोलन के समय ले देखे म आथे। इहां वो दौर म कई ठन नाटक लिखे गइस जेमा हास्य-व्यंग्य के समिलहा रूप देखे म आथे। आरुग गद्य-व्यंग्य लेखन के रूप घलोक इही बखत ले देखब म आथे। इहां के सबले जुन्ना साप्ताहिक पेपर अग्रदूत के फाइल लहुटावत मैं टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के कतकों व्यंग्य देखे अउ पढ़े हावंव।
'बियंग के रंगÓ म संजीव तिवारी जी एकर इतिहास के गजब सुघ्घर उल्लेख करे हावँय। ए किताब ल पढ़ के एकर आदि रूप ले लेके मंझोत बेरा अउ आज के नवा जुग के लेखक अउ उँकर लेखनी ले परिचित होय के अवसर मिलथे- छत्तीसगढ़ी म गद्य साहित्य: विकास के रोपा, बियंग के अरथ अउ परिभासा, बियंग म हास्य अउ बियंग, हास्य अउ बियंग के भेद, देसी बियंग, बियंग के उद्देश्य अउ तत्व, बियंग विधा, बियंग के अकादमिक कसौटी, बियंग के महत्व: बियंग काबर, बियंग के भाखा, छत्तीसगढ़ी बियंग के रंग, अउ बाढ़े सरा जइसे बारा ठन खांचा म बांध के व्यंग्य के जम्मो इतिहास ल पिरोये के उदिम करे गे हवय।
सिरिफ छत्तीसगढ़ी भर के नहीं भलुक ये देश अउ दुनिया के जम्मो नामी अउ पोठ व्यंग्य लेखक मन के विचार ल एमा संघारे गे हवय। डॉ. सुधीर शर्मा के विद्वता ले भरे भूमिका, तमंचा रायपुरी के अपनी बात अउ खुद संजीव तिवारी के दू आखर ये किताब ल अउ एकर उद्देश्य ल समझे खातिर बनेच पंदोली दे के बुता करथे।
वैभव प्रकाशन रायपुर ले प्रकाशित 'बियंग के रंगÓ ल पढ़े के बाद मोला कतकों नवा व्यंग्यकार मनके नांव घलोक जाने बर मिलिस। उंकर रचना संसार के जानकारी मिलिस अउ उंकर सोंच के घलोक जानबा होइस। एकर संगे-संग विविध पत्र-पत्रिका मन म छत्तीसगढ़ी कालम के माध्यम ले कतका झन व्यंग्य लेखन करत हावँय एकरो जानकारी ए किताब ले मिलथे।
'बियंग के रंगÓ के लेखक संजीव तिवारी ल ए किताब खातिर बधाई अउ संगे-संग ए अरजी घलोक के अइसने छत्तीसगढ़ी के अउ आने विधा मन के घलोक ऐतिहासिक जोरन-सकेलन के बुता ल अपन सख भर करत रहँय। 
सुशील भोले, संजय नगर रायपुर 
काबर बेटी मार दे जाथे
कतको सबा, लता, तीजन ह मउत के घाट उतार दे जाथे
देखन घलो नइ पावय दुनिया, गरभे म उनला मार दे जाथे 
बेटा-बेटी ल एक बरोबर नइ समझय जालिम दुनिया ह 
बेटा पाए के साध म काबर बेटी कुआँ म डार दे जाथे?
काबर बेटी मार दे जाथे?
नानपन ले भेद सइथे बेटा ल 'बैटÓ एला 'बाहरीÓ मिलथे
काम-बुता म हाथ बटाथे तभो ले बेटी आघू रहिथे
नाव बढ़ाथे दाई-ददा के अपन मेहनत ले बपरी मन 
तभो 'हीनताÓ के दलदल म काबर इहि डार दे जाथे?
काबर बेटी मार दे जाथे?
दूनो कुल के मान बढ़ाथे, दिन भर सबके सेवा बजाथे
बनथे कभू भाई के राखी, बनके माँ कभू धरम सीखाथे
ईंटा गारा के मकान ला अपन मया ले सरग बनाथे
अइसन त्याग अउ मया करइया दुर्गा अकसर दु:ख ल पाथे?
काबर बेटी मार दे जाथे?
जेन बेटा बर अतका मरथव उही अपन औकात देखाथे
घरफुक्का बनके एक दिन जब बृद्धाश्रम के नाव बताथे
दूसर डाहर देखव बेटीमन, बेटा बनके फरज निभाथे 
झन समझव रे निरबल एला, इही ह एक दिन पार लगाथे
काबर बेटी मार दे जाथे?
पहिली अइसन सोंच ल मारव जउन अइसन काम कराथे
दूनो आँखी हे एक बरोबर तभो ओमा भेद बताथे
जेन दाई ह करेहे पैदा का वो काखरो बेटी नोहय
हे धिक्कार अइसन समाज जउन म बेटी गरू कहाथे
काबर बेटी मार दे जाथे?
- सुनिल शर्मा 'नीलÓ
थान खमरिया, बेमेतरा 

बरखा रानी आजा

गरमी ल सिरवाय बर 
बरखा रानी आजा
बन के मोर नचाय बर  
बरखा रानी आजा
झरगे पान पताई  
ठुठवा होगे बिरवा
रूख राई हरियाय बर 
बरखा रानी आजा। 1
सोन तोर बिन कांसा 
बरखा रानी आजा
नदिया तरिया पियासा 
बरखा रानी आजा
नइ मानय सुरूज देव 
जीना होगे मुस्कुल
जमो ल तोरे आसा  
बरखा रानी आजा। 2
खेते ह फटे हाबे 
बरखा रानी आजा
जम्मो पानी अटागे  
बरखा रानी आजा
नइ सकावत हे ग अब
जेठ आसाढ़ महिना
किसान रोजे कहत हे 
बरखा रानी आजा। 3
बिजली ल चमकाय बर 
बरखा रानी आजा
इन्द धनुस देखाय बर 
बरखा रानी आजा
तोला देख जमो के 
मन म डोहरू आथे
पानी झमम गिराय बर 
बरखा रानी आजा। 4
मया रस चुचवाय बर 
बरखा रानी आजा
हवा घलो बोहाय बर 
बरखा रानी आजा
तोर बिन सुन्न धरती 
आऊ बेरंग अकास
दया मया बगराय बर 
बरखा रानी आजा। 5
बेंगवा ह सुसताय हे 
बरखा रानी आजा
फूल घलो मुरझाय हे
बरखा रानी आजा
एकबार सुन गोहार 
किरपा कर दे तैहा
सबझन हाथ फइलाय हे 
बरखा रानी आजा। 6
- दिनेश रोहित चतुर्वेदी
 खोखरा,जांजगीर

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